नासा का ऑर्बिटर गुजरेगा विक्रम लैंडर की साइट से, जाने क्यों है खास इसरो के लिए

इस हफ्ते NASA का ऑर्बिटर मंगलवार को चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव जहा पर विक्रम लैंडर की हार्ड अथवा सॉफ्ट लैंडिंग हुई थी के ऊपर से गुजरेगा। नासा के ऑर्बिटर विक्रम लैंडर को स्पॉट करने की कोसिस करेगा । स्पेसफ़्लइट नाउ रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी मंगलवार को चंद्रयान -2 की लैंडिंग साइट को स्कैन करने के लिए एलआरओ के शक्तिशाली कैमरे का उपयोग करेगी।

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vikram-lander
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जैसा की आप जानते है की चंद्रयान -2 की सॉफ्ट लैंडिंग 7 सितम्बर 2019 को निर्धारित थी। पर लैंडिंग के अंतिम चरण में विक्रम लैंडर की लैंडिंग सॉफ्ट नहीं थी। चंद्रयान 2 की चन्द्रमा की सतह से 2.1 KM पहले तक सभी परफॉरमेंस ठीक थी पर जैसे ही चंद्रयान 2 का विक्रम लैंडर चन्द्रमा की सतह से 2 km की दूरी में पंहुचा, उसका इसरो के बेस स्टेशन से कम्युनिकेशन टूट गया। चंद्रयान 2 मिशन 90 प्रतिसत सफल माना गया है क्यों की इसरो चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर को चन्द्रमा की कछा में चन्द्रमा की सतह से 100 KM की दूरी पर सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया है। इस ऑर्बिटर का कार्यकाल एक साल से बढ़ा कर 7 साल कर दिया गया है। चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर ने विक्रम लैंडर की थर्मल इमेज खींच कर इसरो बेस स्टेशन भेजी थी। इसरो के साइंटिस्ट विक्रम लैंडर से संपर्क स्थापित करने की पूरी कोसिस कर रहे है हालाँकि की अब इसकी उम्मीद कम ही है।

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इस सप्ताह NASA का ऑर्बिटर मंगलवार को चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव जहा पर विक्रम लैंडर की हार्ड अथवा सॉफ्ट लैंडिंग हुई थी के ऊपर से गुजरेगा। नासा के ऑर्बिटर विक्रम लैंडर को स्पॉट करने की कोसिस करेगा । स्पेसफ़्लइट नाउ रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी मंगलवार को चंद्रयान -2 की लैंडिंग साइट को स्कैन करने के लिए एलआरओ के शक्तिशाली कैमरे का उपयोग करेगी।

नासा की पालिसी के अनुसार, नासा के ऑर्बिटर के एलआरओ कैमरे से लिए गए सारा डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होगा। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के नोआ पेट्रो “NASA’s Goddard Space Flight Center Noah Petro” ने बताया की नासा, ऑर्बिटर द्वारा लिए गए साडी इमेज और डाटा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान इसरो के साथ शेयर करेंगे जिससे भारतीय साइंटिस्टस को डाटा का एनालिसिस करने में मदद मिलेगी।

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यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) ने इसरो द्वारा किए गए चंद्रयान २ मिशन की सराहना करते हुए कहा कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव में लैंडिंग करना बहुत ही कठिन है। ESA के अनुसार चंद्रमा की सतह (दक्षिणी ध्रुव) के अवशेष में आवेशित कण और रेडिएशन होता हैं जिसके परिणाम कभी कभी उम्मीद के परे होते है। चंद्रमा के अवशेष हार्डवेयर से चिपक जाते हैं, जिससे यांत्रिक समस्याएँ पैदा हो सकती हैं और वे सौर पैनलों और विभिन्न सतहों को ढक सकते हैं, जिससे उनकी छमता कम हो जाती है।

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